भाईदूज के दिन भाई, बहेन के घर का ही खाना खाए। ऐसा करने से भाई की आयुवृद्धि होती है। पहला कौर बहेन के हाथ से खाएं। स्कंदपुराण के अनुसार इस दिन जो बहिन के हाथ से भोजन करता है, वह धन एवं उत्तम सम्पदा को प्राप्त होता है। अगर बहेन न हो तो मुँहबोली बहिन या मौसी/मामा की पुत्री को बहेन मान ले। अगर वह भी न हो तो किसी गाय अथवा नदी को ही बहेन बना ले और उसके पास भोजन करे। कहने का आश्रय यह है की यमद्वितीया को कभी भी अपने घर भोजन न करे।
आज के दिन बहेन अपने भाई की 3 बार आरती जरूर उतारे।
आज के दिन बहेन भाई को तथा भाई बहेन को कोई न कोई उपहार जरूर दे स्कंदपुराण के अनुसार विशेषतः वस्त्र तथा आभूषण। आज के दिन भाई बहेन का यमुना जी में नहाना भी बहुत शुभ है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना जी में स्नान करने वाला पुरुष यमलोक का दर्शन नहीं करता।
तस्यां स्वसुः करतलादिह यो भुनक्ति प्राप्नोति रत्नधनधान्यमनुत्तमं सः ।।
कार्तिक शुक्ल द्वितीया को पूर्वकाल में यमुनाजी ने यमराज को अपने घर भोजन कराया था, इसलिए यह ‘यमद्वितीया’ कहलाती है। इसमें बहेन के घर भोजन करना पुष्टिवर्धक बताया गया है। अतः बहेन को उस दिन वस्त्र और आभूषण देने चाहिए। उस तिथि को जो बहेन के हाथ से इस लोक में भोजन करता है, वह सर्वोत्तम रत्न, धन और धान्य पाता है ।
भाईदूईज
यह पर्व भाई-बहेन के पवित्र प्रेम का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन बहेन के घर भोजन करने से भाई की उम्र बढ़ती है। इस पर्व का महत्व इस प्रकार है-
धर्म ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन ही यमुना ने अपने भाई यम को अपने घर बुलाकर सत्कार करके भोजन कराया था। इसीलिए इस त्योहार को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। तब यमराज ने प्रसन्न होकर उसे यह वर दिया था कि जो व्यक्ति इस दिन यमुना में स्नान करके यम का पूजन करेगा, मृत्यु के पश्चात उसे यमलोक में नहीं जाना पड़ेगा। सूर्य की पुत्री यमुना समस्त कष्टों का निवारण करने वाली देवी स्वरूपा है।
उनके भाई मृत्यु के देवता यमराज हैं। यम द्वितीया के दिन यमुना नदी में स्नान करने और यमुना और यमराज की पूजा करने का बड़ा माहात्म्य माना जाता है। इस दिन बहेन अपने भाई को तिलक कर उसकी लंबी उम्र के लिए हाथ जोड़कर यमराज से प्रार्थना करती है। स्कंद पुराण में लिखा है कि इस दिन यमराज को प्रसन्न करने से पूजन करने वालों को मनोवांछित फल मिलता है। धन-धान्य, यश एवं दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
भाई की उम्र बढ़ानी है तो करें यमराज से प्रार्थना
सबसे पहले बहेन-भाई दोनों मिलकर यम, चित्रगुप्त और यम के दूतों की पूजा करें तथा सबको अर्घ्य दें। बहेन भाई की आयु-वृद्धि के लिए यम की प्रतिमा का पूजन करें। प्रार्थना करें कि मार्कण्डेय, हनुमान, बलि, परशुराम, व्यास, विभीषण, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा इन आठ चिरंजीवियों की तरह मेरे भाई को भी चिरंजीवी कर दें।
इसके बाद बहेन भाई को भोजन कराती हैं। भोजन के बाद भाई को तिलक लगाती है। इसके बाद भाई यथाशक्ति बहन को भेंट देता है। जिसमें स्वर्ण,आभूषण, वस्त्र आदि प्रमुखता से दिए जाते हैं। लोगों में ऐसा विश्वास भी प्रचलित है कि इस दिन बहेन अपने हाथ से भाई को भोजन कराए तो उसकी उम्र बढ़ती है और उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
आश्विन पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ बोलते हैं । इस दिन रास-उत्सव और कोजागर व्रत किया जाता है । गोपियों को शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजाकर अपने पास बुलाया और ईश्वरीय अमृत का पान कराया था । अतः शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेष महत्त्व है । इस रात को चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है ।*
शरद पूनम की रात को क्या करें, क्या न करें ?
दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें । नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें ।
अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं । जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लेना ।
इस रात सुई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से नेत्रज्योति बढ़ती है ।
शरद पूनम दमे की बीमारी वालों के लिए वरदान का दिन है । अपने आश्रमों में निःशुल्क औषधि मिलती है, वह चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर में मिलाकर खा लेना और रात को सोना नहीं । दमे का दम निकल जायेगा ।
चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है । शरद पूनम की चाँदनी का अपना महत्त्व है लेकिन बारहों महीने चन्द्रमा की चाँदनी गर्भ को और औषधियों को पुष्ट करती है ।
अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है । जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि में बुद्धिदाता का प्रकाश आता है ।
खीर को बनायें अमृतमय प्रसाद खीर को रसराज कहते हैं । सीताजी को अशोक वाटिका में रखा गया था । रावण के घर का क्या खायेंगी सीताजी ! तो इन्द्रदेव उन्हें खीर भेजते थे ।
खीर बनाते समय घर में चाँदी का गिलास आदि जो बर्तन हो, आजकल जो मेटल (धातु) का बनाकर चाँदी के नाम से देते हैं वह नहीं, असली चाँदी के बर्तन अथवा असली सोना धो-धा के खीर में डाल दो तो उसमें रजतक्षार या सुवर्णक्षार आयेंगे । लोहे की कड़ाही अथवा पतीली में खीर बनाओ तो लौह तत्त्व भी उसमें आ जायेगा । इलायची, खजूर या छुहारा डाल सकते हो लेकिन बादाम, काजू, पिस्ता, चारोली ये रात को पचने में भारी पड़ेंगे । रात्रि 09 बजे महीन कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर 12 बजे के आसपास भगवान को भोग लगा के प्रसादरूप में खा लेनी चाहिए । लेकिन देर रात को खाते हैं इसलिए थोड़ी कम खाना और खाने से पहले एकाध चम्मच मेरे हवाले भी कर देना । मुँह अपना खोलना और भाव करना : ‘लो महाराज ! आप भी लगाओ भोग ।’ और थोड़ी बच जाय तो फ्रिज में रख देना । सुबह गर्म करके खा सकते हो ।
(खीर दूध, चावल, मिश्री, चाँदी, चन्द्रमा की चाँदनी – इन पंचश्वेतों से युक्त होती है, अतः सुबह बासी नहीं मानी जाती ।)*
दीपावली के पर्व पर सभी भक्तजन माँ लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए अनेक प्रकार के जतन करते हैं । कुछ लोग इस दिन विशिष्ट साधनाएँ करते हैं , लेकिन सामान्य पूजन सभी करते हैं । इस दिन सायंकाल में शुभ मुहूर्त में महालक्ष्मी की विविध उपचारों से पूजा -अर्चना की जाती है । एक विशेष समस्या इस पूजा -अर्चना में प्रायः देखी जाती है कि महालक्ष्मी पूजन में प्रयुक्त मन्त्र संस्कृत भाषा में लिखी होने के कारण थोड़े क्लिष्ट होते हैं और इसी कारण आमजन इनका प्रयोग नहीं कर पाते हैं । पाठकगणों की इस समस्या का अनुभव करते हुए हिन्दी मन्त्रों से महालक्ष्मी का पूजन -अर्चना किया जा रहा है । हालॉंकि संस्कृत मन्त्रों का अपना महत्त्व है , लेकिन माँ तो भाव को ही प्रधानता देती है । यदि आप अपनी भाषा में अपने भाव माँ के समक्ष अच्छे से व्यक्त कर सकते हैं , तो वही भाषा आपके लिए सर्वश्रेष्ठ है । आइए , इस दीपावली पर हम अपनी भाषा में अपने भाव व्यक्त करके माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने काप्रयासकरतेहै ।
पूजन हेतु सामग्री
रोली , मौली , लौंग , पान , सुपारी , धूप , कर्पूर , अगरबत्ती , अक्षत (साबुत चावल ), गुड़ , धनिया , ऋतुफल , जौ , गेहूँ , टूब , पुष्प , पुष्पमाला , चन्दन , सिन्दूर , दीपक , रूई , प्रसाद , नारियल , सर्वोषधि , पंचरत्न , यज्ञोपवीत , पंचामृत , शुद्ध जल , खील , मजीठ , सफेद वस्त्र , लाल वस्त्र , फुलेल , लक्ष्मी जीव एवं गणेश जी का चित्र या पाना , चौकी (बाजौट ), कलश , घी , कमलपुष्प , इलायची , माचिस , दक्षिणा हेतु नकदी , चॉंदी के सिक्के , बहीखाता , कलम तथा दवात । आदि ।
पूजा विधान एवं नियम
दीपावली के दिन सायंकाल पूजन करने से पूर्व शुद्ध जल से स्नान करके स्वच्छ एवं सुन्दर वस्त्र धारण कर सकुटुम्ब पूजन करने के लिए तैयार हों । लक्ष्मी जी के पूजन हेतु जो स्थान आपने निश्चित किया है , उसको स्वच्छ जल से धोकर उस पर बैठने हेतु आसन लगाएँ । आपको पूजन करते समय यह अवश्य ही ध्यान रखना है कि आपका मुँह पूर्व दिशा की ओर हो अर्थात् लक्ष्मी जी का चित्र अथवा पाना पूर्व दिशा की दीवार पर लगाना चाहिए । यदि पूर्व दिशा की ओर जगह नही बन पा रही हो , तो आप पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पूजन कर सकते हैं ।
लक्ष्मी पूजन हेतु उपर्युक्त साम्रगी पहले ही एक स्थान पर एकत्र करके एक थाल में तैयार कर लेनी चाहिए । पाटा (चौकी ) पर आसन बिछाकर उस पर श्री गणेश जी एवं लक्ष्मी जी का चित्र स्थापित कर दें । उसके बायीं ओर दूसरे पाटे पर आधे में सफेद वस्त्र एवं आधे में लाल वस्त्र बिछाकर सफेद वस्त्र पर चावल की नौ ढेरी नवग्रह की एवं गेहूँ की सोलह ढेरी षोडशमातृका की बना लें । एक मिट्टी के कलश अथवा तॉंबे के कलश पर स्वस्तिक बनाकर उसके गले में मौली बॉंधकर उसके नीचे गेहूँ अथवा चावल डालकर रखें । उसके ऊपर नारियल पर मौली बॉंधकर रख दें । पूजन प्रारम्भ करने के लिए घी का एक दीपक बनाकर तैयार करके और उसे गणेश जी एवं लक्ष्मी जी के चित्र के समान थोड़े गेहूँ डालकर उस पर रखकर प्रज्वलित कर दें । तत्पश्चात् दीपक पर रोली , चावल , पुष्प चढ़ाएँ एवं निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए प्रार्थना करे।
‘ हे दीपक ! तुम देव हो , कर्म साक्षी महाराज ।
जब तक पूजन पूर्ण हो , रहो हमारे साथ॥ ’
दीपक पूजन के उपरान्त एक जलपात्र में पूजा के निमित्त जल भरकर अपने सामने रखकर उसके नीचे अक्षत , पुष्प डालकर गंगा , यमुना आदि नदियों का निम्नलिखित मन्त्र से आवाहन करे।
गंगा यमुना , गोदावरी नदियन की सिरताज ।
सिंधु , नर्मदा , कावेरी , सरस्वती सब साथ ॥
लक्ष्मी पूजन लक्ष्य है , आज हमारे द्वार ।
सब मिल हम आवाहन करें , आओ बारम्बार ॥
तत्पश्चात् जलपात्र से बायें हाथ में थोड़ासा जल लेकर दाहिने हाथ से अपने शरीर पर छीटें देते हुए बोले ।
वरुण विष्णु सबसे बड़े , देवन में सिरताज ।
बाहर -भीतर देह मम , करो शुद्ध महाराज ॥
फिर तीन बार आचमन करें और उच्चारण करे ।
श्रीगोविन्द को नमस्कार ।
श्री माधव को नमस्कार ।
श्री केशव को नमस्कार ॥
अब दाहिने हाथ में अक्षत , पुष्प , चन्दन , जल तथा दक्षिणा लेकर निम्नलिखित संकल्प बोलें ।
‘ श्रीगणेश जी को नमस्कार । श्री विष्णु जी को नमस्कार । मैं …..( अपने नाम का उच्चारण करें ) जाति …..( आपनी जाति का उच्चारण करें ) गोत्र …..( अपने गोत्र का उच्चारण करें ) आज ब्रह्मा की आयु के द्वितीय परार्द्ध में , श्री श्वेतवाराह कल्प में , वैवस्वत मन्वन्तर में , २८वें कलियुग के प्रथम चरण में , बौद्धावतार में , पृथ्वी लोक के जम्बू द्वीप में , भरत खण्ड नामक भारतवर्ष के …..( अपने क्षेत्र का नाम लें )….. नगर में ( अपने नगर का नाम लें )….. स्थान में ( अपने निवास स्थान का नाम लें ) संवत् २०६७ , कार्तिक मास , कृष्ण पक्ष , अमावस्या तिथि , शुक्रवार को सभी कर्मों की शुद्धि के लिए वेद , स्मृति , पुराणों में कहे गए फलों की प्राप्ति के लिए , धन – धान्य , ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए , अनिष्ट के निवारा तथा अभीष्ट की प्राप्ति के लिए परिवार सहित महालक्ष्मी पूजन निमित्त तथा माँ लक्ष्मी की विशेष अनुकम्पा हेतु गणेश पूजनादि का संकल्प कर रहा हूँ । ’
अब ऐसा कहते हुए गणेश जी की मूर्ति पर अथवा थाल में स्वस्तिक बनाकर सुपारी पर मोली लगाकर रखें ।
उसके उपरान्त गणेश जी का आवाहन निम्नलिखित मन्त्र से करें ।
सिद्धि सदन गज वदन वर , प्रथम पूज्य गणराज ।
प्रथम वन्दना आपको , सकल सुधारो काज ॥
जय गणपति गिरिजा सुवन रिद्धि -सिद्धि दातार ।
कष्ट हरो मंगल करो , नमस्कार सत बार ॥
रिद्धि -सिद्धि के साथ में , राजमान गणराज ।
यहॉं पधारो मूर्ति में , आओ आप बिराज ॥
शोभित षोडशमातृका , आओ यहॉं पधार ।
गिरिजा सुत के साथ में , करके कृपा अपार ॥
सूर्य आदि ग्रह भी , करो आगमन आज ।
लक्ष्मी पूजा पूर्ण हो , सुखी हो समाज ॥
आवाहन के पश्चात् हाथ में अक्षत लेकर सुपारी रूपी गणेश जी पर छोड़ते हुए श्रीगणेश जी को आसन दें ।
इसके उपरान्त गणेश जी का पूजन निम्नलिखित प्रकार से करें । तीन बार जल के छीटें देकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करे ।
पाद्य अर्घ्य वा आचमन , का जल यह तैयार ।
उसको भी प्रेमये , कर लो तुम स्वीकार ॥
पाद्य स्वीकार करें । अर्घ्य स्वीकार करें । आचमन हेतु जल स्वीकार करें ।
यह बोलकर जल के छीटें दें ।
स्नान हेतु जल स्वीकार करें । जल के छीटें दें ।
वस्त्र स्वीकार करें । बोलकर मोली चढ़ाएँ ।
गन्ध स्वीकार करें । रोली चढ़ाएँ ।
अक्षत स्वीकार करें । चावल चढ़ाएँ ।
पुष्प स्वीकार करें । पुष्प चढ़ाएँ ।
धूप स्वीकार करें । धूप करें ।
दीपक के दर्शन करें । दीपक दिखाएँ ।
मिष्टान्न स्वीकार करें । प्रसाद चढ़ाएँ ।
आचमन हेतु जल स्वीकार करें । कहकर जल के छीटें दें ।
ऋतुफल स्वीकार करें । ऋतुफल चढ़ाएँ ।
मुखशुद्धि के लिए पान स्वीकार करें । पान , सुपारी चढ़ाएँ ।
दक्षिणा स्वीकार करें । कहते हुए नकदी चढ़ाएँ ।
नमस्कार स्वीकार करें । नमस्कार करें ।
अब करबद्ध होकर गणेशजी को निम्नलिखित मन्त्र से नमस्कार करे ।
विघ्न हरण मंगल करण , गौरी सुत गणराज ।
मैं लियो आसरो आपको , पूरण करजो काज ॥
षोडशमातृका पूजन
गणेश पूजन के उपरान्त षोडशमातृका का पूजन करना चाहिए । हाथ में चावल लेकर दाहिने हाथ की ओर स्थापित लाल वस्त्र पर आरूढ़ षोडशामातृका पर चावल छोड़ते हुए निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें ।
बेग पधारो गेह मम , सोलह माता आप ।
वंश बढ़े , पीड़ा कटे , मिटे शोक संताप ॥
इसके पश्चात् जिस प्रकार से गणेश जी का पूजन किया था , उसी प्रकार से षोडशमातृका का पूजन करें । अन्त में निम्नलिखित मन्त्र के साथ षोडशमातृका को नमस्कार करें ।
सोलह माता आपको , नमस्कार सत बार ।
पुष्टि तुष्टि मंगल करो , भरो अखण्ड भण्डार ॥
नवग्रह पूजन
बायें हाथ में चावल लेकर दाहिने हाथ से सफेद वस्त्र पर चावल छोड़े एवं निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें ।
रवि शशि मंगल बुध , गुरु शुक्र शनि महाराज ।
राहु केतु नवग्रह नमो , सकल सँवारो काज ॥
हे नवग्रह तुमसे करूँ , विनती बारम्बार ।
मैं तो सेवक आपको , रखो कृपा अपार ॥
इसके पश्चात् जिस प्रकार गणेश जी का पूजन किया था , उसी प्रकार नवग्रह का भी पूजन करें ।
कलश पूजन
कलश पूजन हेतु बायें हाथ में अक्षत लेकर दाहिने हाथ से मिट्टी के कलश (जिसमें शुद्ध जल भरा हो ) पर अक्षत चढ़ाते हुए वरुण देवता का निम्नलिखित मन्त्र से आवाहन करें ।
जल जीवन हे जगत का , वरुण देव का वास ।
सकल देव निस दिन करें , कलश महि निवास ॥
गंगादिक नदियॉं बसें , सागर स्वल्प निवास ।
पूजा हेतु पधारिए पाप शाप हो नाश ॥
इसके पश्चात् जिस प्रकार गणेश जी का पूजन किया गया था , उसी प्रकार कलश का पूजन करें ।
रक्षा विधान विधि
बायें में मौली , रोली , अक्षत , पुष्प तथा दक्षिणा लेकर दाहिने हाथ से बन्द कर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण कर अक्षत को चारों दिशाओं में थोड़ा -थोड़ा छोड़ें ।
पूरब में श्रीकृष्ण जी , दक्षिण में वाराह । पश्चिम केशव दुःख हरे , उत्तर श्रीधर शाह ॥
ऊपर गिरधर कृष्ण जी , शेषनाग पाताल ।
दसों दिशा रक्षा करें , मेरी नित गोपाल ॥
इसके पश्चात् उपर्युक्त मौली , रोली , चावल , पुष्प आदि गणेश जी को चढ़ाएँ और मौली उठाकर सभी देवताओं गणेश जी , लक्ष्मी जी आदि को चढ़ाएँ । इसके पश्चात् परिजनों के बॉंधते हुए तिलक करें ।
अब लक्ष्मी पूजन करने के लिए पूर्व स्थापित लक्ष्मी जी की तस्वीर के पास चॉंदी की कटोरी में अथवा अन्य बर्तन में चॉंदी के सिक्के अथवा प्रचलित रुपए के सिक्कों को कच्चे दूध एवं पंचामृत से स्नान कराएँ एवं फिर पुष्प एवं चावल दाहिने हाथ में लेकर श्री महालक्ष्मी का आवाहन निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए करें ।
जयजगजननी , जय , रमा , विष्णुप्रिया जगदम्ब ।
बेग पधारो गेह मम , करो न मातु विलम्ब ॥
पाट विराजो गेह मम , भरो अखण्ड भंडार ।
श्रद्धा सहित पूजन करूँ , करो मातु स्वीकार॥
मातु लक्ष्मी करो कृपा , करो हृदय में वास ।
मनोकामना सिसद्ध करो , पूरण हो मेरी आस ॥
यही मोरि अरदास , हाथ जोड़ विनती करूँ ।
सब विधि करों सुवास , जय जननी जगदम्बा ॥
सब देवन के देव जो , हे विष्णु महाराज ।
हो उनकी अर्धांगिनी , हे महालक्ष्मी आप ॥
मैं गरीब अरजी धरूँ ; चरण शरण में माय ।
जो जन तुझको पूजता , सकल मनोरथ पाय ॥
आदि शक्ति मातेश्वरी , जय कमले जगदम्ब ।
यहॉं पधारो मूर्ति में , कृपा करो अविलम्ब ॥
इस प्रकार दोनों हाथों से पुष्प एवं चावल लक्ष्मी जी के पास छोड़े और तीन बार जल के छीटें दे और उच्चारण करें ।
पाद्य स्वीकार करें , अर्घ्य स्वीकार करें , आचमन हेतु जल स्वीकार करें ।
नमस्कार करते हुए मन्त्र कहें :
पाद्य अर्घ्य व आचमन का जल है यह तैयार ।
उसको भी माँ प्रेम से , कर लो तुम स्वीकार ॥
इसके पश्चात् ‘दुग्ध स्नान स्वीकार करें ’ कहते हुए दूध के छींटें दें तथा पंचामृत से स्नान करवाते हुए निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें ।
दूध , दही घी , मधु तथा शक्कर से कर स्नान ।
निर्मल जल से कीजियो , पीछे शुद्ध स्नान ॥
वस्त्र स्वीकार करें ऐसा कहते हुए मौली चढ़ाएँ तथा निम्नलिखित मन्त्र से प्रार्थना करें ।
कुंकुम केसर का तिलक , और माँग सिन्दूर ।
लेकर सब सुख दीजियो , कर दो माँ दुःख दूर ॥
नयन सुभग कज्जल सुभग , लो नेत्रों में डाल ।
करो चूडियों से जननी , हाथों का श़ृंगार ॥
अक्षता स्वीकार करें , कहते हुए चावल चढ़ाएँ ।
‘ पुष्प स्वीकार करें ’ कहते हुए पुष्प अर्पित करें ।
धूप स्वीकार करें , कहते हुए धूप करें तथा निम्नलिखित मन्त्र से प्रार्थना करें ।
गन्ध अक्षत के बाद में , यह फूलों का हार ।
धूप सुगन्धित शुद्ध घी का , दीपक है तैयार ॥
‘ दीप ज्योति का दर्शन करें ’, कहते हुए दीपक दिखाएँ ।
‘ मिष्टान्न एवं ऋतुफल स्वीकार करें ’, कहते हुए प्रसाद चढ़ाएँ तथा निम्नलिखित मन्त्र से प्रार्थना करें ।
भोग लगाता भक्ति से , जीमो रुचि से धाप ।
करो चुल्लू ऋतफल सुभग , आरोगो अब आप ॥
‘ आचमन हेतु जल स्वीकार करें ’, कहते हुए पान सुपारी चढ़ाएँ तथा निम्नलिखित मन्त्र से प्रार्थना करें ।
ऐलापूगी लवंगयुत , माँ खालो ताम्बूल ।
क्षमा करो मुझसे हुई , जो पूजा में भूल ॥
‘ दक्षिणा स्वीकार करें ’, कहते हुए नकदी चढ़ाएँ और निम्नलिखित मन्त्र से प्रार्थना करें ।
क्या दे सकता दक्षिणा , आती मुझको लाज ।
किन्तु जान पूजांग यह , तुच्छ भेंट है आज ॥
नमस्कार करें और निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें ।
विष्णुप्रिया सागर सुता , जनजीवन आधार ।
गेह वास मेरे करो , नमस्कार शतवार ॥
इसके पश्चात् दीपमालिका पूजन करें ।
जो व्यक्ति सायंकाल (प्रदोषकाल ) में लक्ष्मी पूजन करते हैं , वे लक्ष्मी पूजन करने के पश्चात् तथा जो व्यक्ति रात्रि में पूजन करते हैं , उन्हें सायंप्रदोषकाल में दीपकों का पूजन अपनी पारिवारिक परम्परा के अनुसार करना चाहिए । एक बड़े थाल के बीच में बड़ा दीपक तथा अन्य छोटे दीपकों को शुद्ध जल से स्नान करवाकर रखें । उसमें शुद्ध नई रुई की बत्ती बनाकर सरसों के तेल या तिल्ली के तेल से प्रज्वलित करें और दाहिने हाथ में अक्षत एवं पुष्प अर्पित करते हुए निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें ।
हे दीपक ! तुम देव हो , कर्मसाक्षी महाराज ।
जब तक पूजन पूर्ण हो , रहो हमारे साथ ॥
शुभ करो कल्याण करो आरोग्य सुख प्रदान करो ।
बुद्धि मेरी तीव्र करो , दीप ज्योति नमस्कार हो ॥
आत्म तत्त्व का ज्ञान दो , बोधिसत्व प्रकाश दो ।
दीपावली समर्पित तुम्हें , मातेश्वरी स्वीकार करो ॥
इस मन्त्र का उच्चारण कर दीपकों को नमस्कार करें एवं जल के छीटें दें । इसके पश्चात् लक्ष्मी जी की आरती करने के लिए दिपकों में से बड़ा दीपक लक्ष्मी जी के सामने रखें तथा आरती करें
लक्ष्मी जी की आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता , मैया जय लक्ष्मी माता ॥
तुमको निसदिन सेवत , हर विष्णु धाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा , रमा , ब्रह्माणी , तुम ही जग माता ॥
सूर्य , चन्द्रमा ध्यावत , नारद ऋषि गाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रूप निरंजनी , सुख -संम्पत्ति दाता ॥
जो कोई तुमको ध्यावत ऋद्धि सिद्धि धन पाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल निवासिनी , तू ही शुभ दाता ॥
कर्म प्रभाव प्रकाशिनि , नव निधि की दाता ॥
॥ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहती , तहँ सब सद्गुण आता॥
सब सम्भव हो जाता , मन नहीं घबराता ॥
॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥
तुम बिन यज्ञ न होवे , वस्त्र न हो पाता ॥
खान -पान अरु वैभव तुम बिन नहीं आता ॥
॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥
शुभ गुण मन्दिर सुन्दर , क्षीरदधि जाता ॥
रत्न चतुर्दश तुम बिन , कोई नहीं पाता ॥
॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥
आरती श्री लक्ष्मीजी की जो कोई नर गाता ॥
उर आनन्द समाता , पाप उत्तर जाता ॥
॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥
स्थिर चर जगत बखाने , कर्म प्रचुर लाता ॥
जो कोई मातु आपकी , शुभ दृष्टि पाता ॥
॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥
जय लक्ष्मी माता , मैया जय लक्ष्मी माता ॥
तुमको निशदिन सेवत , हर विष्णु धाता ॥
॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥
क्षमा प्रार्थना
ब्रह्माविष्णुशिव रुपिणी , परम ब्रह्म की शक्ति ।
मुझ सेवक को दीजिए , श्रीचरणों की भक्ति ॥
अपराधी नित्य का , पापों का भण्डार ।
मुझ सेवक को कीजियो , दुःखसागर से पार ॥
हो जाते हैं पूत तो , कई पूत अज्ञान ।
पर माता तो कर दया , रखती उनका ध्यान ॥
ऐसा मन में धारकर , कृपा करो अवलम्ब ।
और प्रार्थना क्या करूँ ? तू करुणा की खान ॥
त्राहि -त्राहि मातेश्वरी , मैं मूरख अज्ञान ॥
धरणी पर जब तक जीऊँ , रटूँ आपका नाम ।
तब दासों के सिद्ध सब , हो जाते हैं काम ॥
इसके पश्चात् ‘श्री महालक्ष्मी की जय ’ सब एक साथ बोलें तथा सारे कुटुम्ब के लोग मिलकर श्री गणेशजी , वरुण , षोडशमातृका , नवग्रह और महालक्ष्मी को प्रणाम करके कहें कि ‘हे सभी देवताओं ! आप सब तो यथास्थान प्रस्थान कीजिए तथा श्रीमहालक्ष्मी एवं ऋद्धि -सिद्धि और शुभ -लाभ सहित गणेश जी आप हमारे घर में और व्यापार में विराजमान रहिए और अन्त में हाथ जोड़कर निम्नलिखित उच्चारण करें । ’
त्राहि -त्राहि दुःखहारिणी , हरो बेगि सब त्रास ।
जयति -जयति जयलक्ष्मी , करो दुःखों का नाश ॥
इस सरल विधि के द्वारा जो लोग संस्कृत के क्लिष्ट शब्दों का उच्चारण नहीं कर सकते वो इसके द्वारा पूजन कर सकते है ।